लाला लाजपत राय: स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता की कहानी
लाला लाजपत राय का योगदान
नई दिल्ली: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में साइमन कमीशन का विरोध एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। इस आंदोलन का नेतृत्व 63 वर्षीय लाला लाजपत राय ने किया, जिन्होंने अंग्रेजों के सामने साहस के साथ खड़े होकर अपनी आवाज उठाई। उनका जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब में हुआ था। वे एक क्रांतिकारी नेता, लेखक और प्रखर राष्ट्रवादी थे, जिन्हें 'पंजाब केसरी' के नाम से भी जाना जाता है।
1927 में जब ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन का गठन किया, तो पूरे देश में इसका विरोध शुरू हुआ। इस आयोग का उद्देश्य भारत सरकार अधिनियम 1919 की समीक्षा करना था, जिसमें सभी सदस्य अंग्रेज थे।
साइमन कमीशन के विरोध का कारण
इस आयोग में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया था, जिससे भारतीयों में अपमान की भावना जागृत हुई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1927 में इसके बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया। जहां भी साइमन कमीशन गया, वहां काले झंडे दिखाए गए और 'साइमन वापस जाओ' के नारे गूंजने लगे।
सरकार ने विरोध को दबाने के लिए कई स्थानों पर धारा 144 लागू की। लाला लाजपत राय ने इस अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नेतृत्व किया और अहिंसक तरीके से जनता को एकजुट किया। 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के खिलाफ एक बड़ा जुलूस निकाला गया।
जुलूस का नेतृत्व और पुलिस का दमन
इस जुलूस का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। प्रदर्शन बढ़ता देख पुलिस अधीक्षक जेम्स ए स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दिया। अंग्रेजी पुलिस ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं, जिससे लाला लाजपत राय को गंभीर चोटें आईं। इसके बावजूद, उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया।
लाला लाजपत राय का निधन
उन्होंने कहा था कि उनके शरीर पर पड़ा हर वार अंग्रेजी साम्राज्यवाद की कब्र में कील है। इस लाठीचार्ज के बाद उनकी तबीयत बिगड़ती चली गई और 17 नवंबर 1928 को चोटों के कारण उनका निधन हो गया।
उनकी शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया। लाला लाजपत राय का जीवन शिक्षा, समाज सुधार और देश की आजादी के लिए समर्पित था। आज भी उनकी कुर्बानी युवाओं को साहस और बलिदान की प्रेरणा देती है।
