भारत-पाक विभाजन: हाथी का बंटवारा और अन्य चुनौतियाँ
विभाजन की जटिलताएँ
भारत और पाकिस्तान का विभाजन एक अत्यंत कठिन कार्य था, जो स्वतंत्रता के साथ-साथ आया। यह समय तनाव और संघर्ष से भरा हुआ था। यह तय किया गया कि ब्रिटिश भारत को दो देशों में विभाजित किया जाएगा। इस कार्य के लिए सर सिरिल रैडक्लिफ़, एक अंग्रेज़ वकील, को नियुक्त किया गया था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि रैडक्लिफ़ ने 'नक्शे पर एक रेखा खींचकर' विभाजन किया। हालांकि भौगोलिक विभाजन हो गया, लेकिन सेना, धन और संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण तत्वों का बंटवारा अभी बाकी था। इस दौरान एक ऐसा समय आया जब दोनों देशों के बीच एक हाथी के बंटवारे को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। स्वतंत्रता दिवस पर हम जानते हैं कि उस हाथी में क्या खास था और इसे बाँटना क्यों कठिन था?
राजेंद्र प्रसाद-सरदार पटेल बनाम लियाकत-जिन्ना
16 जून, 1947 को गवर्नर-जनरल जेनकिंस ने लॉर्ड माउंटबेटन के साथ मिलकर पंजाब विभाजन समिति का गठन किया। इसका मुख्य कार्य वित्त, सेना और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के बंटवारे पर सलाह देना था। बाद में इस समिति का नाम विभाजन परिषद रखा गया। कांग्रेस की ओर से सरदार वल्लभभाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद थे, जबकि अखिल भारतीय मुस्लिम लीग से लियाकत अली खान और अब्दुर रब निश्तर शामिल थे।
विभाजन के लिए 70 दिन की समय सीमा
अन्वेषा सेनगुप्ता की रिपोर्ट के अनुसार, विभाजन परिषद के पास ब्रिटिश भारतीय राज्य के बंटवारे के लिए केवल 70 दिन का समय था। इस समय में सभी विभागों की संपत्ति और वित्तीय देनदारियों का बंटवारा करना था।
सेना का बंटवारा और मुसलमानों से बदला
विभाजन परिषद के सामने सबसे बड़ी चुनौती सेना का बंटवारा था। इस प्रक्रिया में, सेना का दो-तिहाई हिस्सा भारत में रहा, जबकि एक-तिहाई पाकिस्तान भेजा गया। रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 2,60,000 सैनिक भारत में रहे, जिनमें अधिकांश हिंदू और सिख थे। वहीं, लगभग 1,40,000 सैनिक पाकिस्तान गए, जिनमें अधिकतर मुस्लिम थे।
धन और अन्य संपत्तियों का बंटवारा
विभाजन समझौते के अनुसार, पाकिस्तान को ब्रिटिश भारत की 17.5 प्रतिशत संपत्ति और देनदारियाँ मिलीं। भारत ने 15 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपये दिए। हालांकि, 75 करोड़ रुपये की राशि विवाद में उलझ गई।
हाथी का बंटवारा
रिपोर्टों के अनुसार, जानवरों का भी बंटवारा हुआ। औपनिवेशिक बंगाल के वन विभाग के हाथी, जॉयमोनी, को भी बंटवारे में समस्याओं का सामना करना पड़ा। जॉयमोनी की कीमत एक स्टेशन वैगन के बराबर थी। अंततः, अंग्रेजों की मदद से यह तय हुआ कि पश्चिम बंगाल को यह वाहन और पूर्वी बंगाल को यह हाथी मिलेगा।
कलेक्टर की चतुराई
हालांकि, जॉयमोनी उस समय मालदा में था, जो पश्चिम बंगाल में आता था। इस मुद्दे में एक नया आयाम जुड़ गया। मालदा के कलेक्टर ने तर्क दिया कि हाथी का खर्च पूर्वी बंगाल सरकार को उठाना चाहिए। यह विवाद अंततः राजनयिक हलकों तक पहुँचा और संभवतः मुख्य सचिवों के स्तर पर सुलझाया गया।
ब्रिटिश अधिकारियों की भूमिका
राष्ट्रीय सेना संग्रहालय के अनुसार, विभाजन के दौरान कई ब्रिटिश अधिकारी यहीं रुक गए। इनमें जनरल सर रॉबर्ट लॉकहार्ट, जो भारत के पहले सेनाध्यक्ष बने, और जनरल सर फ्रैंक मेसेर्वी, जो पाकिस्तान के पहले सेनाध्यक्ष बने, शामिल थे।
