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गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति की शाही बग्घी: एक ऐतिहासिक यात्रा

गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति की शाही बग्घी का जुलूस हर साल एक प्रमुख आकर्षण होता है। यह बग्घी न केवल परंपरा का प्रतीक है, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास से भी जुड़ी हुई है। जानें कि कैसे 1947 में बंटवारे के दौरान इस बग्घी का मालिकाना हक सिक्के के उछाल से तय हुआ और क्या होता अगर भारत टॉस हार जाता। इस बग्घी की यात्रा आज़ादी की एक दिलचस्प कहानी बताती है।
 
गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति की शाही बग्घी: एक ऐतिहासिक यात्रा

गणतंत्र दिवस पर बग्घी का महत्व


हर वर्ष, गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति की शाही बग्घी का जुलूस समारोह का एक प्रमुख आकर्षण होता है। इस वर्ष, जब राष्ट्रपति, यूरोपीय संघ के नेताओं के साथ, कर्तव्य पथ पर आए, तो लोगों की उत्सुकता और बढ़ गई। सभी की नजरें इस भव्य बग्घी पर थीं। यह बग्घी केवल शान और परंपरा का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारत के इतिहास के एक महत्वपूर्ण क्षण को भी दर्शाती है। यदि उस दिन सिक्के का उछाल अलग होता, तो यह बग्घी पाकिस्तान का प्रतीक बन सकती थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि यह बग्घी भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के साथ जुड़ी हुई है और इसकी यात्रा आज़ादी की एक दिलचस्प कहानी बताती है।


पहला गणतंत्र दिवस और बग्घी

भारत के संविधान के लागू होने के बाद, पहला गणतंत्र दिवस 26 जनवरी, 1950 को मनाया गया। उस दिन, देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसी शाही बग्घी में परेड ग्राउंड पहुंचे। तब से, यह बग्घी राष्ट्रपति की गरिमा और परंपरा का प्रतीक बन गई है। प्रारंभिक वर्षों में, इसका उपयोग राष्ट्रपति भवन और अन्य आधिकारिक समारोहों के लिए किया जाता था।


शाही बग्घी की विशेषताएँ

राष्ट्रपति की बग्घी ब्रिटिश काल की विरासत है, जिसमें वायसराय आधिकारिक कार्यक्रमों में यात्रा करते थे। इसका डिज़ाइन अत्यंत भव्य है, जिसमें सोने की परत चढ़ी हुई है और दोनों तरफ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक जड़ा हुआ है। इसे खींचने वाले घोड़े भी विशेष रूप से चुने जाते हैं। पहले, इसे छह ऑस्ट्रेलियाई घोड़े खींचते थे, लेकिन अब परंपरा के अनुसार चार घोड़ों का उपयोग किया जाता है।


बंटवारे के समय बग्घी का विवाद

1947 में देश के बंटवारे के दौरान, न केवल ज़मीन और सेना का विभाजन हुआ, बल्कि हर संपत्ति का भी बंटवारा हुआ। इस प्रक्रिया में, दोनों देशों ने वायसराय की शाही बग्घी पर अपना दावा किया। भारत और पाकिस्तान दोनों इसे अपनी राष्ट्रीय विरासत मानते थे।


सिक्के के उछाल से तय हुआ बग्घी का मालिकाना हक

बग्घी को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि कोई सीधा समाधान नहीं मिल पाया। अंततः यह तय हुआ कि कैरिज का मालिकाना हक सिक्का उछालकर तय किया जाएगा। भारत की तरफ से प्रेसिडेंट्स बॉडीगार्ड रेजिमेंट के पहले कमांडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह थे, जबकि पाकिस्तान की तरफ से साहिबजादा याकूब खान थे। सिक्का उछाला गया, और किस्मत ने भारत का साथ दिया। टॉस भारत के पक्ष में गया, और शाही कैरिज भारत की संपत्ति बन गई।


अगर भारत हार जाता?

इतिहासकारों का मानना है कि यदि उस दिन भारत टॉस हार जाता, तो कैरिज पाकिस्तान के पास चली जाती। संभवतः आज भारत के राष्ट्रपति किसी अन्य परिवहन में होते, और यह शाही कैरिज पाकिस्तान का प्रतीक बन जाती। एक छोटे से फैसले ने इतिहास का रुख बदल दिया।


विशेष अवसरों पर बग्घी का उपयोग

हालांकि, कैरिज पूरी तरह से इतिहास के पन्नों में गुम नहीं हुई। 2014 में, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बीटिंग रिट्रीट समारोह के दौरान इस शाही कैरिज का उपयोग किया था। 2017 में, राम नाथ कोविंद ने अपनी राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण समारोह के दिन इसी कैरिज में बैठकर राष्ट्रपति भवन की ओर प्रस्थान किया। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और प्रतिभा पाटिल को भी विशेष अवसरों पर इस कैरिज में देखा गया है।