79वीं स्वतंत्रता दिवस पर सुदर्शना कुमारी की विभाजन की दर्दनाक कहानी
भारत की स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ
इस वर्ष भारत अपनी स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह अवसर हमें देशभक्ति और हर्षोल्लास का अनुभव कराता है, लेकिन साथ ही विभाजन से जुड़ी दुखद यादें भी ताजा कर देता है। 15 अगस्त 1947 को हमें आज़ादी मिली, लेकिन कई लोगों को अपनी मातृभूमि छोड़नी पड़ी। विभाजन के समय कई परिवारों ने अपनी नौकरियाँ और घर छोड़कर पाकिस्तान या भारत में शरण ली और इस दौरान हिंसा का शिकार हुए। आइए, हम आपको सुदर्शना कुमारी की कहानी सुनाते हैं।
सुदर्शना कुमारी का परिचय
सुदर्शना कुमारी का जन्म 1939 में पाकिस्तान के शेखपुरा जिले में हुआ, जो अब पंजाब प्रांत का हिस्सा है और लाहौर से लगभग 24 मील दूर है। विभाजन के समय सुदर्शना केवल 8 वर्ष की थीं, जब दोनों देशों में सांप्रदायिक हिंसा अपने चरम पर थी।
आग से बचने की कोशिश
द पार्टिशन म्यूज़ियम को दिए एक पुराने इंटरव्यू में, सुदर्शना ने बताया कि उनकी माँ शाम के समय छत पर रोटियाँ सेंक रही थीं, तभी पड़ोसी सतपाल ने उन्हें आग लगने की सूचना दी। पास की लकड़ी की फैक्ट्री में दंगाइयों ने आग लगा दी थी। उनकी माँ ने तुरंत कुछ सामान एक संदूक में रखा और छत से कूदकर सुरक्षित स्थान पर पहुँच गईं।
दंगाइयों का आतंक
सुदर्शना ने बताया कि वे अपने शहर के एक अन्य घर में छिप गईं। वहाँ वे दो दिन भूखे रहे। छत के छेदों से झाँककर उन्होंने दंगाइयों को देखा, जो लूटपाट कर रहे थे और जो भी सामने आता, उसे मार रहे थे।
परिवार का नुकसान
सुदर्शना ने याद किया कि दंगाइयों ने उनके चाचा के पूरे परिवार को मार डाला, जिसमें उनकी एक साल की बेटी भी शामिल थी। हालांकि, चाचा की एक बेटी भागने में सफल रही, लेकिन उसे गोली लगी।
भागने की यात्रा
सुदर्शना और उनकी माँ एक पुरानी घाटी में पहुँचीं, जहाँ उन्होंने एक पक्के घर में शरण ली। वहाँ और भी लोग थे जो भागकर आए थे। कुछ दिनों बाद, वे कंपनी बाग पहुँचीं, जहाँ उन्होंने जले हुए घरों में खेलना शुरू किया।
भारत की ओर यात्रा
सुदर्शना ने बताया कि उन्होंने काफिले वाले ट्रक का इंतज़ार किया, जो उन्हें भारत ले जाने वाला था। 300 से अधिक लोगों को दो ट्रकों में ठूंसकर वाघा सीमा के पास छोड़ा गया, जहाँ से वे अपनी माँ के साथ भारत पहुँचीं और शरणार्थी शिविर में काफी समय बिताया।
