भारत के राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' का 150वां वर्ष: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की विरासत
150 वर्षों का जश्न
7 नवंबर 2025 का दिन भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। आज राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह गीत, जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1874 को अक्षय नवमी के अवसर पर लिखा था, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा बना। इसने न केवल आजादी की लड़ाई में नई ऊर्जा भरी, बल्कि भारतीय साहित्य को भी एक नई दिशा दी। इस विशेष अवसर पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक स्मरणोत्सव कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे।
समारोह का महत्व
दिल्ली में आयोजित होने वाले इस समारोह में, पीएम मोदी एक विशेष स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी करेंगे। यह आयोजन उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित है, जिन्होंने 'वंदे मातरम' के उद्घोष से देश को आजादी की ओर अग्रसर किया। यह गीत आज भी हर भारतीय के दिल में राष्ट्रभक्ति की भावना को प्रज्वलित करता है।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का योगदान
19वीं सदी में, जब भारत अंग्रेजों के शासन में था, बंगाल ने कई महान प्रतिभाओं को जन्म दिया। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय एक ऐसा नाम है जो आज भी गूंजता है। उन्होंने 'वंदे मातरम' को संस्कृतनिष्ठ बंगाली में लिखा और स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी। उनका मानना था कि भारत को अपनी प्राचीन सभ्यता की ओर लौटना चाहिए, न कि पश्चिमी जीवनशैली को अपनाना चाहिए।
'कृपया बंदे मातरम कहें'
अपने उपन्यास आनंदमठ में, चटर्जी ने अंग्रेजों द्वारा लिखे गए इतिहास को बेतुका बताया। उन्होंने भारतीय विरासत को उसके आक्रमणकारियों के दृष्टिकोण से परिभाषित करने की अवधारणा को खारिज किया। चटर्जी ने भारत को एक देवी माँ के रूप में प्रतिष्ठित किया और स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ताओं में जोश भरा।
एक बहुआयामी व्यक्तित्व
चटर्जी केवल एक उपन्यासकार ही नहीं, बल्कि एक कवि, निबंधकार और पत्रकार भी थे। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक होने वाले पहले दो छात्रों में से एक थे। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को बंगाल और भारतीय उपमहाद्वीप के साहित्यिक पुनर्जागरण का एक प्रमुख व्यक्ति माना जाता है।
शिक्षा और प्रशासन में योगदान
27 जून 1838 को एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में जन्मे, चटर्जी ने शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई। उन्होंने कला और कानून सहित विभिन्न क्षेत्रों में कार्य किया और डिप्टी कलेक्टर के रूप में भी काम किया। रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें अपना गुरु माना और उनके साहित्यिक योगदान की सराहना की।
भारत के लुप्त घटक
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने भारतीय समाज में दो महत्वपूर्ण घटकों की कमी को पहचाना: भाषाई कौशल और मातृभूमि के प्रति भावनात्मक जुड़ाव। 'वंदे मातरम' ने इन दोनों कमियों को दूर किया और मातृभूमि के प्रति भक्ति व्यक्त करने का एक माध्यम प्रदान किया।
वंदे मातरम का महत्व
यह गीत भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक ज्वलंत प्रतीक बन गया और इसके कारण अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। इसकी जड़ें 19वीं सदी के संन्यासी विद्रोह की कथा में निहित हैं।