केरल का नाम बदलने की प्रक्रिया: केरलाम की कहानी
केरल का नाम बदलने की प्रस्तावना
केरल, जो दक्षिणी तटीय राज्य है, हाल ही में अपने नाम को लेकर चर्चा में है। केरल की वाम मोर्चा (LDF) सरकार ने राज्य का नाम "केरल" से "केरलाम" में बदलने का प्रस्ताव दिया था, जिसे अब केंद्रीय सरकार ने मंजूरी दे दी है। इस मंजूरी के बाद, संविधान की अनुसूची में बदलाव किया जा सकेगा। इसके परिणामस्वरूप, लोग "केरल" और "केरलाम" नामों के अर्थ जानने के लिए उत्सुक हो गए हैं।
नाम परिवर्तन का कारण
केरल के लोग अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं। यहाँ की मुख्य भाषा मलयालम है, जिसमें राज्य का नाम "केरलाम" है, जबकि अंग्रेजी और हिंदी में इसे "केरल" कहा जाता है। 24 जून 2024 को, केरल विधानसभा ने राज्य का नाम "केरलाम" में बदलने का प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में यह भी उल्लेख किया गया कि राज्य का नाम संविधान की पहली अनुसूची में "केरल" के रूप में दर्ज है।
केरल नाम की उत्पत्ति
राज्य का मूल नाम मलयालम में "केरलाम" है। हालांकि, सरकारी दस्तावेजों में इसे "केरल" के रूप में दर्ज किया गया है। यह नाम स्वतंत्रता के बाद से अस्तित्व में आया, जब राज्यों का गठन भाषा के आधार पर किया जा रहा था। केरल राज्य का गठन 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम के तहत हुआ। संविधान के निर्माताओं ने इसका नाम "केरल" रखा।
नारियल से जुड़ा अर्थ
राज्य का नाम नारियल के पेड़ से जुड़ा हुआ है। मलयालम में 'केरा' का अर्थ 'नारियल का पेड़' और 'आलम' का अर्थ 'भूमि' है। जब इन दोनों शब्दों को मिलाया जाता है, तो यह 'नारियल के पेड़ों की भूमि' बन जाता है। इस प्रकार, 'केरल' का अर्थ है नारियल के पेड़ों की भूमि।
राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया
भारत में किसी भी राज्य का नाम बदलने के लिए एक लंबी संवैधानिक प्रक्रिया होती है। हालांकि नाम बदलना आसान नहीं है, संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत राज्य को अपने नाम को बदलने का पूरा अधिकार है। नाम परिवर्तन के लिए चार महत्वपूर्ण चरण हैं:
1. राज्य विधानसभा से प्रारंभ: जिस राज्य का नाम बदलना है, उसके लिए सरकार विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित करती है, जिसके बाद एक रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी जाती है।
2. राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक: केंद्रीय सरकार की मंजूरी के बाद, फाइल राष्ट्रपति के पास उनकी सहमति के लिए भेजी जाती है।
3. संसद में विधेयक का पारित होना आवश्यक: राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद, संसद में एक विशेष विधेयक प्रस्तुत किया जाता है। हालांकि, विधेयक के पारित होने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है।
4. अंतिम चरण: जब विधेयक संसद द्वारा पारित हो जाता है, तो इसे राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित किया जाता है। अंततः, एक अधिसूचना जारी की जाती है, जो राज्य को आधिकारिक नाम प्रदान करती है।