अंसीरा अंची: संघर्ष से सफलता की प्रेरणादायक कहानी
संघर्ष की कहानी
नई दिल्ली: केरल की अंसीरा अंची की यात्रा उन कठिनाइयों से भरी है, जहां जीवन ने बार-बार उनकी हिम्मत को परखा। 18 साल की उम्र में विवाह के बाद उनकी शिक्षा रुक गई और जीवन में कई तरह की बाधाएं आ गईं। जिस शिक्षा को वह अपने विकास का साधन मानती थीं, वही उनके लिए संघर्ष का कारण बन गई। उनके फोन को तोड़ा गया, किताबें जलाई गईं और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। फिर भी, बच्चों के उज्जवल भविष्य की आशा ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
शादी के बाद पढ़ाई में आई रुकावट
ससुराल में समय बिताने के साथ अंसीरा की परिस्थितियां और भी कठिन होती गईं। जब भी उन्होंने पढ़ाई की बात की, उनके साथ हिंसा होने लगी। उन्होंने बताया कि उनकी किताबें जला दी गईं और बच्चों के साथ भी मारपीट हुई। कई बार उन्हें भोजन के लिए भी परेशान किया गया। नौकरी मिलने के बावजूद घर से बाहर न निकलने की धमकी दी जाती थी। अंततः, हिंसा बढ़ने पर वह अपने बच्चों के साथ माता-पिता के पास लौट आईं और अपने जीवन को फिर से संवारने का निर्णय लिया।
बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष
अंसीरा के दो बच्चे थे और उनकी जिम्मेदारियों ने उन्हें चिंतित कर दिया। उन्होंने समझा कि बच्चों को बेहतर जीवन देने के लिए उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत होना होगा। इसी दौरान, उनके एक रिश्तेदार ने PSC की तैयारी शुरू की, जिससे उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरणा मिली। एक पुराने शिक्षक ने भी उन्हें हिम्मत दी और आर्थिक चिंताओं को छोड़कर अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने को कहा।
पढ़ाई के प्रति अडिग संकल्प
करीब 25 वर्ष की उम्र में, अंसीरा छोटे बच्चे और शिशु को संभालते हुए कोचिंग जाती थीं। दिन की जिम्मेदारियों के बाद रात उनकी पढ़ाई के लिए समर्पित होती थी। उन्होंने बताया कि बच्चों के सोने के बाद वह आधी रात तक चुपचाप किताबें पढ़ती थीं। कई बार पढ़ाई के लिए सोने का बहाना बनाना पड़ता था। कठिन परिस्थितियों में भी वह हर परीक्षा की तैयारी करती रहीं।
परीक्षा में सफलता
अंसीरा ने बताया कि उन्होंने लगभग 5 लाख उम्मीदवारों के बीच परीक्षा दी। उस समय वह 12वीं पास थीं, जबकि उनके आस-पास MBA और इंजीनियरिंग जैसी डिग्री वाले उम्मीदवार भी थे। तीन बार मां बनने के बाद शारीरिक परीक्षा पास करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन उन्होंने इसे भी पार किया। परीक्षा और ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वह पुलिस अधिकारी बनीं।