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स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बीच का अंतर: जानें महत्वपूर्ण बातें

भारत 79वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहा है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से तिरंगा फहराया। यह उनका 12वां संबोधन है। इस लेख में, हम स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को समझेंगे, जिसमें झंडा फहराने की प्रक्रिया और राष्ट्रपति के पद की भूमिका शामिल है। जानें कि कैसे ये दोनों दिन हमारे देश के लिए महत्वपूर्ण हैं और क्या है इनकी परंपरा।
 

स्वतंत्रता दिवस का जश्न


देश 79वें स्वतंत्रता दिवस (Independence Day 2025) के उत्सव में मग्न है। इस अवसर पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से तिरंगा फहराया और देशवासियों को संबोधित किया। यह पीएम मोदी का लाल किले से 12वां संबोधन है। उन्होंने पहले भी कई बार भगवा पगड़ी पहनी है, लेकिन यह पहली बार है जब उनकी जैकेट और पगड़ी दोनों का रंग भगवा है। स्वतंत्रता दिवस पर, प्रधानमंत्री हर साल 15 अगस्त को लाल किले पर झंडा फहराते हैं। वहीं, गणतंत्र दिवस पर, राष्ट्रपति राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर झंडा फहराते हैं।


राष्ट्रपति का पद और झंडा फहराने की परंपरा

1950 से पहले राष्ट्रपति का कोई पद नहीं था
हमारा संविधान 26 जनवरी को लागू हुआ, इसलिए इस दिन राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं। भारत के राष्ट्रपति को संविधान का रक्षक माना जाता है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद 26 जनवरी 1952 से 1962 तक पहले राष्ट्रपति रहे। 1950 से पहले हमारे देश में राष्ट्रपति जैसा कोई पद नहीं था। इसलिए, 15 अगस्त 1947 को, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पहली बार झंडा नीचे से ऊपर की ओर फहराया। इस प्रक्रिया को ध्वजारोहण कहा जाता है।


ध्वजारोहण की प्रक्रिया

ध्वजारोहण और ध्वजारोहण में अंतर
यह भ्रम इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि लोग आमतौर पर "ध्वजारोहण" और "ध्वजारोहण" को एक ही समझते हैं। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब झंडा पहली बार नीचे से ऊपर की ओर फहराया गया। तब से यह परंपरा बन गई है कि प्रधानमंत्री लाल किले पर झंडा फहराते हैं, जिसका अर्थ है आजादी का जश्न और एक नए युग की शुरुआत। गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर, झंडा पहले से ही ऊपर होता है और राष्ट्रपति उसे रस्सी खोलकर फहराते हैं। यह दिन संविधान, लोकतंत्र और संस्थाओं के सम्मान का प्रतीक है।