भारत की प्राथमिक शिक्षा में संभावित बदलाव: नई रिपोर्ट से खुलासा
प्राथमिक शिक्षा में बदलाव की संभावना
भारत की प्राथमिक शिक्षा प्रणाली में आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) द्वारा प्रस्तुत एक नई अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, 2011 से 2036 के बीच 5 से 9 वर्ष के बच्चों की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आ सकती है। यह कमी स्कूलों में दाखिले, स्कूलों की संख्या और शिक्षा से संबंधित संसाधनों की योजना पर प्रभाव डाल सकती है।
रिपोर्ट का सारांश
‘How India Is Transforming Education Capacity Under the New Education Policy 2020’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट को SBI के मुख्य आर्थिक सलाहकार और EAC-PM सदस्य सौम्य कांति घोष और अर्थशास्त्री शशिधरण शर्मा ने तैयार किया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्राथमिक शिक्षा की उम्र वाले बच्चों की घटती संख्या देश में कम होती प्रजनन दर का संकेत है।
2036 तक, 5 से 9 वर्ष के बच्चों की संख्या 10 करोड़ तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट में राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अनुमानों के अनुसार, 2011 में इस आयु वर्ग के लगभग 12.53 करोड़ बच्चे थे। 2026 तक यह संख्या घटकर 11.27 करोड़ रहने का अनुमान है।
प्रजनन दर में कमी
रिपोर्ट में प्रजनन दर में कमी का भी उल्लेख किया गया है। 2019 में भारत की कुल प्रजनन दर 2.1 थी, जो 2024 में घटकर 1.9 रह गई।
स्कूलों में दाखिले का रुझान
बच्चों की संख्या में कमी के साथ स्कूलों में दाखिले का रुझान भी बदल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2012-13 से 2021-22 के बीच ग्रामीण स्कूलों में कक्षा 1 से 12 तक के कुल नामांकन में लगभग 78 लाख की कमी आई।
राज्यों में भिन्नता
राज्यों में नामांकन का रुझान एक समान नहीं है। उत्तर प्रदेश में कुल नामांकन स्थिर रहा, जबकि बिहार में नामांकन और स्कूलों की संख्या दोनों में वृद्धि हुई।
NEP 2020 का प्रभाव
NEP 2020 में स्कूल क्लस्टर मॉडल पर जोर दिया गया है, जिससे छोटे स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र एक साथ काम कर सकते हैं।