डॉ. भाभा की रहस्यमय मौत: क्या यह एक दुर्घटना थी या साज़िश?
डॉ. होमी जहांगीर भाभा: भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक
डॉ. होमी जहांगीर भाभा, जिन्हें भारत का ओपेनहाइमर कहा जाता है, ने देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की नींव रखी। एक दूरदर्शी वैज्ञानिक और संस्थान निर्माता के रूप में, उन्होंने उस समय भारत के तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए, जब देश स्वतंत्रता के बाद संघर्ष कर रहा था। उनकी आकस्मिक मृत्यु 1966 में एक विमान दुर्घटना में हुई, जो आज भी कई सवाल खड़े करती है: क्या यह एक साधारण दुर्घटना थी या इसके पीछे कोई साज़िश थी?
1966 का मोंट ब्लैंक विमान हादसा
24 जनवरी, 1966 को, एयर इंडिया की फ्लाइट कंचनजंगा, जो मुंबई से न्यूयॉर्क जा रही थी, फ्रेंच आल्प्स में मोंट ब्लैंक से टकरा गई। इस दुर्घटना में सभी 117 यात्रियों की जान चली गई, जिनमें डॉ. भाभा भी शामिल थे। वह अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की बैठक में भाग लेने के लिए वियना जा रहे थे।
फ्रांसीसी जांच ने यह निष्कर्ष निकाला कि यह दुर्घटना नेविगेशन की गलती के कारण हुई। रिपोर्ट में कहा गया कि कॉकपिट और एयर ट्रैफिक कंट्रोल के बीच गलत संचार के कारण विमान खराब मौसम में सुरक्षित ऊंचाई से नीचे चला गया, जिससे यह पहाड़ से टकरा गया।
क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण ने सभी को संतुष्ट किया?
इस दुर्घटना के कई पहलुओं ने संदेह को जन्म दिया। विमान को कैप्टन जे.टी. डिसूजा उड़ा रहे थे, जो एयर इंडिया के सबसे अनुभवी पायलटों में से एक थे। विशेषज्ञों का मानना था कि नेविगेशन की गलती की संभावना कम थी। इसके अलावा, विमान का ब्लैक बॉक्स कभी नहीं मिला, और मलबा एक बड़े क्षेत्र में फैला हुआ था, जिससे कुछ लोग मानते हैं कि यह एक नियंत्रित लैंडिंग की विफलता के बजाय हवा में विस्फोट का संकेत हो सकता है।
परमाणु कोण
भाभा की मृत्यु के आसपास एक प्रमुख सिद्धांत विदेशी खुफिया एजेंसियों की संलिप्तता को इंगित करता है। अमेरिकी लेखक ग्रेगरी डगलस ने अपनी पुस्तक "कन्वर्सेशन्स विद द क्रो" में पूर्व सीआईए अधिकारी रॉबर्ट क्रॉली का हवाला देते हुए कहा है कि भारत की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए विमान के कार्गो होल्ड में एक बम रखा गया था। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन उस समय के भू-राजनीतिक संदर्भ ने इसे महत्वपूर्ण बना दिया।
डॉ. भाभा ने अपनी मृत्यु से कुछ हफ्ते पहले कहा था कि यदि राजनीतिक मंजूरी मिल जाए, तो भारत 18 महीनों में परमाणु बम बना सकता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद दिए गए इस बयान ने पश्चिमी शक्तियों को चिंतित कर दिया।
डॉ. भाभा की वैज्ञानिक विरासत
डॉ. भाभा ने विज्ञान और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना की और एटॉमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन बने, जिससे भारत के न्यूक्लियर इकोसिस्टम की नींव पड़ी। उनका तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम, जो भारत के विशाल थोरियम भंडार पर आधारित है, देश की ऊर्जा रणनीति का आधार बना हुआ है। फिजिक्स में इलेक्ट्रॉन-पॉज़िट्रॉन इंटरैक्शन पर उनके काम से भाभा स्कैटरिंग की खोज हुई।