आरएसएस के पहले सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार की अनकही कहानी
आरएसएस का नेतृत्व और डॉ. हेडगेवार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख को 'सरसंघचालक' कहा जाता है। इसके पहले सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार थे। उनके बाद गुरु गोलवलकर, मधुकर दत्तात्रेय देवरस, रज्जू भैया, प्रो. सुदर्शन और वर्तमान में मोहन भागवत इस पद पर रहे हैं। लक्ष्मण वासुदेव परांजये भी कुछ समय के लिए इस पद का हिस्सा रहे।
आरएसएस में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पद सरकार्यवाह (महासचिव) है, जिसके लिए हर तीन साल में चुनाव होते हैं। वर्तमान में दत्तात्रेय होसबोले इस पद पर कार्यरत हैं। परंपरा के अनुसार, सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी का चयन वरिष्ठ पदाधिकारियों की सलाह पर करते हैं। पहले सरसंघचालक के चुनाव के समय, डॉ. हेडगेवार को इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया था।
डॉ. हेडगेवार की प्रतिक्रिया
आरएसएस की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन हुई थी, लेकिन पहले चार वर्षों तक सरसंघचालक का पद नहीं था। डॉ. हेडगेवार के जीवनी लेखक नाना पालकर के अनुसार, अक्टूबर 1929 में नागपुर में एक बड़ी सभा का आयोजन किया गया। डॉ. हेडगेवार ने महसूस किया कि निष्ठावान कार्यकर्ताओं की बैठक अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने सभी राज्य आरएसएस नेताओं को एक पत्र भेजकर 9 और 10 नवंबर को नागपुर में होने वाली बैठक में आने का अनुरोध किया।
जब सभी प्रचारक और स्वयंसेवक एकत्र हुए, तो यह महसूस हुआ कि एक प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता है। डॉ. हेडगेवार को इन चर्चाओं से दूर रखा गया था। वरिष्ठ पदाधिकारियों ने मिलकर निर्णय लिया कि डॉ. हेडगेवार को सरसंघचालक के रूप में चुना जाएगा।
डॉ. हेडगेवार की असहमति
डॉ. हेडगेवार को सरसंघचालक के रूप में चुने जाने पर असंतोष था। उन्होंने अप्पाजी जोशी के सामने अपनी नाराजगी व्यक्त की, खासकर समारोह के तरीके पर। जोशी ने संगठन के सुचारू संचालन के लिए औपचारिक प्रमुख की आवश्यकता बताई। उस दिन दो अन्य महत्वपूर्ण पदों की भी घोषणा की गई, जिसमें बालाजी हुद्दार को सरकार्यवाह और मार्तण्डराव जोग को सरसेनापति चुना गया।